धुंध...भेड़िये....बिट्टो hindi kahani।।रहस्य-रोमाँच।। suspence story।।

 धुंध... भेड़िये... बिट्टो

 (हिंदी कहानी-सीमा खन्ना)


धुंध...भेड़िये....बिट्टो hindi kahani।।रहस्य-रोमाँच।। suspence story।।

धुंध बढ़ती जा रही थी। कुछ ही देर में पूरा इलाका मटमैली चादर से ढक जाएगा।पहाड़ों की रातें, शाम से ही शुरू हो जाती हैं।ऐसे में मरियल से लैंपपोस्ट के नीचे, दो लड़कियां खड़ी थी।पास ही बस स्टैंड का जंग लगा बोर्ड लगा था।

बोर्ड के पास ही एक बर्फ से ठंडी बर्थ लगी हुई थी जिस पर लड़की चाह कर भी बैठ नहीं पा रही थीं औऱ खुद को कछुए सा समेटती हुई, लैम्पपोस्ट का सहारा ले कर खड़ी हुई थी। दूसरी लड़की बैचेनी से टहलते हुए मोबाईल नेटवर्क ढूढ़ रही थी जो अब शायद ही मिले।
पीछे जंगल का इलाका था।अजीब सी रहस्मय आवाज़ो का समय शुरू हो गया था।कड़ाके की ठंड मानो जिस्म में हरकत करते खून को भी जमा देने वाली थी।
लैंप पोस्ट वाली लड़की हथेलियों को रगड़ कर गर्माहट की नाकाम कोशिश करने लगी।मोबाईल वाली लड़की बक्से को बिछा कर उस पर धम्म से बैठ गई।

सामने की चिकनी काली सड़क सूनसान अकेली दूर तक चली गई थी।आदम जात का नामोनिशान नहीं था।
तभी जंगल की तरफ से आती हुई कच्ची सड़क से खट्ट खट्ट की आवाज आने लगी।बक्से वाली लड़की, लैंप पोस्ट वाली के पास खिसक आई। आवाज के साथ साथ एक रौशनी का धुंधला सा धब्बा भी उनके पास आता जा रहा था।

पास आता हुआ साया अब बूढ़ी औरत में बदल गया था। जिसके एक हाथ में डंडा दूसरे में लैंप था जो बड़ी मंदिम सी झपकती हुई रौशनी दे रहा था जो इस वीराने में 100 वाट के बल्ब  जैसा था।
पास आते आते बुढ़िया डंडा ज़ोर ज़ोर से पटकने लगी।दोनों लड़कियां कौतुहल औऱ डर से और चिपक गई।
कौन...? कौन हो... बुढ़िया ने लैंप की रौशनी दोनों के चेहरे पर डाली।दोनों कुछ बोलती इससे पहले ही बुढ़िया की आँखे जुगनू सी चमकने लगी।

अरे बिट्टो यहाँ क्या कर रही हो ..? घर क्यों नहीं आयीं ? कहा था तुम्हारी माँ से बच्चीयों को अकेले मत भेजना, टोली आती है भेड़ियो की...अब चलो भेड़िये आते ही होंगे। बुढ़िया ने डंडे वाले हाथ से बक्से वाली का कंधा छुआ।
लैंपपोस्ट  वाली ने बक्से वाली को देखा।बक्से वाली खुद स्तब्ध थी।
चलो बिटिया,पास ही घर है.. भेड़िये आते ही होंगे.... बुढ़िया ने तीसरी बार दोहराया।

इस बार बक्से वाली ने बक्सा उठा लिया और बैग जबरदस्ती लैम्पपोस्ट वाली को पकड़ा दिया और बुढ़िया के पीछे चल पड़ी।
बमुश्किल 30 कदम की दूरी पर ही एक घुमावदार मोड़ पर चढ़ाई थी।बुढ़िया अभ्यस्त कदमो से आगे बढ़ रही थी।और वो दोनों मुश्किल से थके कदमों से बुढ़िया का अनुसरण कर रही थी।

कुछ कदम चलने के बाद बुढ़िया एक काले,पुराने, लेकिन बड़े से गेट के सामने रुक गई और उसे अंदर धकेलते हुये बोली।
आओ बिट्टो.….दरवाजा बंद कर दो, भेड़िये ना आ जाये... चौथी बार दोहराया।
दोनों अंदर आ गई।बुढ़िया ने मोटे, काले दरवाजे पर पुरानी कढ़ी वाली संकल चढ़ा कर ताला लगा दिया।

वो लैंप उठा कर फिर आगे बढ़ गयी।दोनों मोहनी में बंधी हुई उसके पीछे पीछे थी।आगे छोटी सी राहदारी थी जिस पर पहाड़ी पत्थर बिछे थे और सख्त जमीन का आभास दे रहे थे। दाये - बायें की जगह बगीचे जैसी थी।सामने छोटी सी थकी हुई गैलरी थीं।
आओ बिट्टो...बुढ़िया ने लैंप दीवार की खूँटी पर टांग दिया औऱ दरवाजे को अंदर धकेल दिया।दोनों अंदर आ गई।
अनापेक्षित बड़ा सा हॉल नुमा ड्राइंग रूम पुरानी चीज़ो से भरा हुआ था। दीवार एक तरफ फ़ायर बॉक्स बना हुआ था जिसमें आग जल रही थी।बुढ़िया ने संकल चढ़ा दी।

आओ बिट्टो.....दरवाजा ना खोलना,कहीं भेड़िये ना आ जाये।बुढ़िया ने पांचवी बार कहा औऱ जूते किनारे पर उतार दिए।
दोनों कौतुहल औऱ भय से अटी पड़ी कभी बुढ़िया और कभी उस गर्माये हुए विशाल कमरे को देख रही थी।

बुढ़िया बहुत जल्दी ही गर्म गर्म रोटियां बना लायी थी जैसे उनके आने की खबर पहले से हो।पुरानी सी केतली में चाय थी जिसे बुढ़िया ने खास लंबे गिलासों में उड़ेल दिया।दोनों भयंकर शंकाग्रस्त होने के बावजूद पेट भर रोटी भी खा गई और चाय भी पी गई।बुढ़िया बिट्टो बिट्टो कहती हुई जाने कितने ही किस्से सुना गई।

दोनों का बाहर धुंध में गुम होने का कोई मन नहीं था।रात गहराने लगी थी।बुढ़िया के पास जाने किस्सो का ख़जाना था।आँखों में चमक थी कुछ मिल जाने की।दोंनो को कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

गहरी धुंध के बावजूद कमरे में कुछ सफेद उजास रौशनदान से छन कर अंदर भर रहा था।बक्से वाली ने महसूस किया कोई उन्हें हिलारहा है।दिमाग में घंटी बजी तो तुरंत उठ बैठी, बुढ़िया सामने थी।लैंप वाली अभी भी गहरी नींद में थी।
उठो बिट्टो...कुछ खा पी लो,कैम्प जाने वाली बस ठीक7बजे निकलेंगी।बुढ़िया चाय गिलासों में उड़ेल रही थी।लड़की ने पहली बार गौर से देखा बुढ़िया की ममतामयी भरी हुई आँखों को.... वो अंदर चली गई।लड़की ने दूसरी लैंप वाली लड़की को जगाया।वो झटके से उठी और बावलों की तरह उनींदी आँखों से इधर उधर देखने लगी।

थोड़ी देर बाद दोनों चाय के साथ पहाड़ी दाल की भरवाँ रोटी खा रही थी।
ये कौन है ..? लैंप वाली ने तस्वीर की तरफ इशारा किया।
बुढ़िया की चमकीली आँखों में उदासी की धुंध जमने लगी।
बिट्टो...मेरी बिट्टो..बुढ़िया के होंठ बड़बड़ाये।
दोनों को लगा रीढ़ की हड्डी में कुछ लहरा गया।

बुढ़िया धुंध को चीरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी और दोंनो उसके कदमो को नापती हुई यकीन से पीछे पीछे आगे बढ़ रही थी।

बस चल पड़ी...फिर आना बिट्टो..अब भिड़िये नहीं आयेंगे..बुढ़िया ने छटी बार कहा औऱ वापिस मुड़ गयी।

                                                  समाप्त

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