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वार्ड नंबर -14
(Horror story-seema khanna)
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ऐना जिला अस्पताल की हैड नर्स थी। अपने  जीवन के पिछले 15 साल का अधिकतर समय उसने अस्पताल में ही बिताया था।
किसी की मौत देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। हां दुःख जरूर होता था। मरीज के परिजनों को रोता बिलखता देख कर वो कुछ देर के लिये निराश हो जाती है। लेकिन ये सब उसके काम का ही हिस्सा हैं।
वार्ड नंबर -14 में उसकी ड्यूटी लगती रहती थी और नए पुराने पेशेंट भी मिलते रहते थे।लेकिन वो मरीज नया नहीं था।वो एक कोमा का पेशेंट था और पिछले दो साल से उसी संजीव-निर्जीव अवस्था में उस वार्ड के बेड नंबर 7 का स्थाई  मरीज बन गया था।
आज ऐना की नाईट शिफ्ट थी। उसे वार्ड नम्बर-14 तक पहुँचने के लिए एमरजेंसी वार्ड और मुर्दा घर के आगे से हो कर गुजरना था।भले ही ये उसकी ड्यूटी है और महीने में 15दिन उसकी नाईट शिफ्ट होती है और वो विशाल गराउंड जो बीच में है वो पार भी करती है लेकिन आज भी उसे  मुर्दा घर के आगे से निकलते हुए डर लागता है।
ऐना की ड्यूटी 7 बजे से शुरू होनी है।ये जनवरी की सर्द शाम हैं।कोहरा पड़ने लगा है।सर्दी की शामे ऐसी ही होती हैं। वो आगे  बड़ती जा रही है। एमर्जेन्सी वार्ड  क्रॉस हो चुका है। अब मुर्दा घर की बारी है। ना चाहते हुए भी उसकी नज़र मुर्दाघर के कॉरिडोर तक चली ही जाती है।पीली उदास रहस्यमय रौशनी पूरे कॉरिडोर में फ़ैली हुई है।आज सब  सून-सान है। बाक़ी दिनों में  मृतक के उदास परेशान परिजन इधर-उधर टहलते हुए दिख ही जाते हैं।
ऐना सामने वार्ड की बिल्डिंग की तरफ नज़र दौड़ाती है।सब तरफ सून-सान है।गर्मियों में ऐसा नहीं होता लोग 12 बजे तक टहलते हुए मिल जायेंगे। लेकिन इस कोहरे में कौन  बेवज़ह टहलेग। वो अपने अपने कदमो को थोड़ा और तेज़ कर देती हैं।
वार्ड 14 सामने ही है। कोई 20,22 कदमो की दूरी है।पीली रौशनी कॉरिडोर में फैली हुई है।ऐना को एक काला साया वार्ड के दरवाजे पर मंडराता हुआ दिखता है। लेकिन कुछ स्पष्ट नहीं है।होगा कोई मरीज के साथ आया हुआ या कोई स्टाफ का आदमी।
ऐना वार्ड 14 में कदम रखती है। इस अजीब से ठंडा हवा का झोंका उससे टकराता है वो सिहर जाती है।दरवाजे की बगल में ही कोमा के मरीज का बेड है। बाकी उस वार्ड में हरे परदे के पार्टीशन में चार बेड ही लग सकते हैं। इस वक़्त सिर्फ कोमा का मरीज़ ही है।
वो आगे के स्टाफ रुम में  पहुँचती है वो कमरा कोई ज्यादा बड़ा नहीं है।उस कमरे के आगे वार्ड 13 है जिसमे 12 बेड लगे  हैं।उसमे कभी कभार एक या दो बेड ही खाली होते हैं बाक़ी में मरीज रहते ही है। ये दो वार्ड  मुर्दाघर के सामने है इस लिए जल्दी से कोई यहाँ अपनी ड्यूटी नहीं करवाना चाहता।
ऐना अपना ओवरकोट उतार कर खूंटी पर टाँग देती है।अंदर उसने एक मोटी स्वेटर पहनी हुई है।उसके हाथ ठन्डे हो रहे हैं।वो हीटर ऑन कर के हाथ सेंकने लगती है।फोन  पर हरी को चाय लाने के लियें कहती है।
उसे पूरा यक़ीन है  उन अनहोनी  बातों पर जिन्हें लोग सुनते तो बड़े चाव से हैं लेकिन मानते नहीं।
उसका रूम वार्ड 14 और 13 के बीच में है।कमरे में दो दरवाजे हैं।सामने की दीवार पर एक खिड़की है जहाँ से मुर्दाघर साफ नज़र आता है।
ऐना रिजिस्टर उठती है और वार्ड 13 में एक एक मरीज़ का निरिक्षण कर के एन्ट्री करती है।कुछ मरीज़ तो दो -तीन महीने से वहाँ हैं। दो एक दिन में नर्सो डॉक्टरों से पहचान हो ही जाती है। 10 मिनट में ऐना एन्ट्री कंपलीट कर के वापिस स्टाफ रूम में आ जाती है।अब वार्ड 14 की बारी है।पता नहीं क्यों उसे आज डर लग रहा है।वो पर्दा हटाती है।अंदर कदम रखती है।
कोमा का मरीज सामने ही है।कोई उसके पास बैठा है।वो उसे पहचानती है।मरीज़ की माँ है।रोज वही होती हैं उसके पास या कभी कभार घर का बूढ़ा नोकर।लेकिन पिछले दो दिन से वो आई नहीं थी।
ऐना ने आवाज लगाई "मिसेज़ पारीख "
वो थोड़ा और आगे आई..मिसेज पारीख एक टक अपने बेटे को ताक रही थी। गमो से टूटी हुई उस माँ की हालत वो समझती है।पिछले दो साल से वो उस से एक ही सवाल करती है।" मेरा बेटा ठीक हो जायेगा ना.." आज कमरे में ठंडक ज्यादा थी।उसने भी मरीज के चेहरे को देखा बिना कुछ कहे वापिस स्टाफ रूम वापिस आ गई।
कोमा का मरीज जब लाया गया था तो महज 30 साल का था।उसका 2साल का एक बेटा था। पत्नी थी।एक अकक्सीडेंट ने उसकी ये हालत कर दी थी। एक महीने तक पत्नी और उसके घर वाले भी आते थे लेकिन जल्दी ही सिर्फ मरीज की माँ और बूढ़ा नोकर ही रह गए।
ऐना को दुःख होता है।सुना है मरीज की पत्नी अपने मायके चली गई है।और अब आयेगी भी नहीं। आज कुछ ज्यादा सर्दी है।सामने खिड़की जोर जोर से फड़फड़ा रही है। वो उठ कर बंद करने वाली है क़ि सामने मुर्दाघर पर नज़र पड़ती है।कोई लाश आई है।वो खिड़की कस के बंद कर देती है।और वापिस कुर्सी पर आ कर बैठ जाती है।
नो बजने वाले है।डॉक्टर राउंड पर आनेवाले हैं।तभी डॉक्टर अवस्थी कमरे में आते हैं।वो झट से रजिस्टर ले कर खड़ी हो जाती है।
"सब ठीक है सिस्टर " उनका रटा -रटाया जुमला है।
"यस डॉक्टर " वो डॉक्टर के साथ वार्ड 13 की तरफ चल देती हैं। रूटीन चेकअप है।कुछ दिशा निर्देशो के बाद डॉक्टर जाने लगते हैं।
"डॉक्टर वार्ड 14 के पेशेंट को भी देख लीजिये.. उसकी मदर बहुत परेशान हैं.."
"चलो..आई होप कोई मिरेकल हो जाये " डॉक्टर अवस्थी अस्पताल के सीनियर और दयालु डॉक्टर्स में से एक हैं।
ऐना डॉक्टर के साथ वार्ड में प्रवेश करते हैं।मरीज़ तो बिस्तर पर है लेकिन उसकी मदर वहाँ नहीं हैं।
"अभी तो यहीं थी,कहाँ गई?" ऐना इधर उधर देखती है।दरवाजा भी बंद है। डॉक्टर मरीज को चेक करते हैं।सब पहले जैसा ही है।दोनों रुम में वापिस आ जाते हैं।
डॉक्टर जा चुके है।रात अपनी रफ़्तार से आगे बड़ रही है। एक बजे से ऊपर का वक़्त हैं।ऐना पास के लंबे सोफे जैसे बैंच पर लेटी है।वैसे उसके साथ एक नर्स और होती है लेकिन आज वो छुटी पर है।
कुछ अजीब से हल्की आवाजें ऐना को सुनाई देती हैं।वो ध्यान देती हैं आवाजें वार्ड 14 से आ रही हैं। उसे ध्यान आता है मिसेज़ पारीख का ,वो झट से उठ जाती हैं।एक पर्दे का ही फासला है वार्ड 14 में ,"उसने दुबारा चेक क्यों नहीं किया।मिसेज पारीख ठीक नहीं लग रही थी।"वो अपने आप से ही सवाल कर रही थी।
जैसे ही ऐना ने पर्दा हटाया उसके मुँह से घुटी घुटी सी चींख निकल गई।एक काला साया मरीज के ऊपर झुका हुआ था।उसके चीखते ही साया हवा में उठा और बवंडर की तरह बाहर निकल गया।बंद दरवाजे भट्ट की आवाज के साथ खुल गए।कमरे में बर्फीली हवा भरने लगी।
ऐना इतनी जोर से डर गई थी वो चीख़ती हुई बदहवास सी वार्ड 13 की तरफ भागी।उसकी आवाज से कुछ ही देर में मरीज और उनके परिजन जाग गए । वो बस बदहवासी में वार्ड 14 की तरफ इशारा कर रही थी।
डॉक्टर अवस्थी के अलावा वार्ड बॉय और नर्से सभी इकठ्ठा हो चुके थे। वार्ड 14 में सब ने प्रवेश किया। दो साल से कोमा में  पड़े मरीज़ के शारीर में हलचल हो रही थी।सब आश्चर्य से देख रहे थे।
वार्ड में एक अजीब से धुंध भरी हुई थी।तभी हरी  हांफता हुआ वार्ड के अंदर आया।उसकी आँखो में दुःख और डर भरा हुआ था।
"क्या हुआ...इतने घबराये हुए क्यों हो ?" डॉक्टर अवस्थी ने पूछा।
" वो..वो ..लाश..मुर्दाघर में मिसेज़ पारीख की लाश पड़ी है.." बमुश्किल हरी ने कहा।
"क्या..होश में तो हो..अभी ..नो बजे तो वो यहीं बैठी थी।"
ऐना ने बदहवासी से कहा।उसका पूरा बदन काँपने लगा था।
"नहीं सिस्टर ,नो बजे तो इनकी लाश लाई गई थी..दो दिन से भूखी प्यासी मंदिर की सीढ़ियां कभी चढ़ती थी कभी उतरती थी..पैर फिसल गया..और उठी ही नहीं..खबर कर दी है इनके नोकर को..."हरी ने दुःख के साथ कहा।वो भी दो साल से मिसेज पारीख के दुःख को जनता था।
सब स्तब्ध थे।ऐना के मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।वो बस रोये जा रही थी। दो साल से कोमा में पड़ा मरीज़ होश में आ चुका था।और उसकी आँखें अपनी माँ को तलाश रही थी।
कुछ दिनों में सब कुछ नार्मल होने लगा था।वार्ड 14 का पेशेंट जा चुका था।आज कई दिनों के बाद फिर ऐना की ड्यूटी वार्ड 14 में लगी थी।वो मुर्दाघर के आगे से गुजर रही थी।
"मेरा बेटा ठीक हो गया ना S S S.."ऐना के कानों में मिसेज़ पारीख की  बर्फ से भी ज्यादा ठंडी आवाज़ गूंजी।और वो बदहवास सी वार्ड 14 की तरफ भागने लगी।

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